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समस्तीपुर में प्रशासनिक बैठकों का ज़मीनी असर क्यों नहीं दिखता?

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जिलाधिकारी लगातार बैठकें और जनता दरबार कर रहे हैं, लेकिन आम लोगों की शिकायत है कि प्रखंड और अंचल स्तर पर अधिकारियों के रवैये में बदलाव नहीं दिख रहा। पढ़िए विशेष संपादकीय।

समस्तीपुर/आलम की खबर:जिले में लगभग हर सप्ताह किसी न किसी महत्वपूर्ण विषय को लेकर समीक्षा बैठकें आयोजित होती हैं। समाहरणालय के सभागार में घंटों तक योजनाओं की समीक्षा होती है, अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए जाते हैं, जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान की बात कही जाती है और प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने के दावे किए जाते हैं। जिलाधिकारी स्वयं लगातार सक्रिय दिखाई देते हैं। वे जनता दरबार लगाते हैं, अधिकारियों के साथ मैराथन बैठकें करते हैं और हर विभाग को स्पष्ट निर्देश देते हैं कि आम लोगों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इन बैठकों और निर्देशों का असर वास्तव में जमीन पर दिखाई देता है?

यदि आम लोगों से बात की जाए तो जवाब अक्सर निराशाजनक मिलता है। लोगों का कहना है कि जिलाधिकारी के आदेश और निर्देश कई बार केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। प्रखंड, अंचल और नगर निकाय स्तर पर स्थिति जस की तस बनी रहती है। आम आदमी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाता रहता है, लेकिन समाधान समय पर नहीं हो पाता।

सबसे गंभीर बात यह है कि कई अधिकारी आम लोगों का फोन उठाना भी जरूरी नहीं समझते। जनता घंटों कार्यालयों के बाहर इंतजार करती है, आवेदन देती है, लेकिन सुनवाई की गति बेहद धीमी रहती है। यही कारण है कि प्रशासनिक बैठकों में दिए गए निर्देश और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है।

रोसड़ा अंचल कार्यालय और सिंघिया नगर पंचायत जैसे कई कार्यालयों को लेकर आम लोगों के बीच लगातार शिकायतें सुनने को मिलती हैं। लोगों का आरोप है कि समस्याओं के समाधान में अनावश्यक देरी होती है और आम नागरिकों को बार-बार कार्यालयों का चक्कर लगाना पड़ता है। कई लोग यह भी कहते हैं कि फोन करने पर अधिकारी जवाब नहीं देते, जिससे जनता की परेशानी और बढ़ जाती है।

हालांकि यह भी सच है कि प्रशासनिक व्यवस्था चलाना आसान काम नहीं है। अधिकारियों पर काम का दबाव रहता है, संसाधनों की कमी होती है और कई बार तकनीकी बाधाएं भी सामने आती हैं। लेकिन इसके बावजूद आम जनता की अपेक्षा यही रहती है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए और समय पर समाधान हो।

जिलाधिकारी की सक्रियता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। वे लगातार समीक्षा बैठकें कर रहे हैं, विभागों को निर्देश दे रहे हैं और योजनाओं की प्रगति पर नजर बनाए हुए हैं। लेकिन अब आवश्यकता इस बात की है कि उन निर्देशों की जमीनी मॉनिटरिंग भी उतनी ही सख्ती से हो। केवल बैठकें कर लेना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि जिन अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं, वे उनका पालन कर भी रहे हैं या नहीं।

प्रशासनिक व्यवस्था तभी मजबूत मानी जाएगी जब आम आदमी को कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें, फोन का जवाब मिले, आवेदन पर समय पर कार्रवाई हो और जनता को यह महसूस हो कि सरकार और प्रशासन वास्तव में उनके लिए काम कर रहा है।

आज जरूरत केवल आदेश देने की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की भी है। यदि किसी विभाग में लगातार शिकायतें आ रही हैं तो उसकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए। जनता से फीडबैक लिया जाना चाहिए और लापरवाही मिलने पर कार्रवाई भी दिखनी चाहिए। तभी बैठकों और निर्देशों का वास्तविक असर जमीन पर दिखाई देगा।

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जनता को राहत देना है, लेकिन जब योजनाओं का लाभ समय पर नहीं पहुंचता तो लोगों का भरोसा कमजोर होने लगता है। यही कारण है कि अब प्रशासनिक बैठकों के साथ-साथ उनके परिणामों की समीक्षा भी उतनी ही जरूरी हो गई है।

जिलाधिकारी को चाहिए कि वे समय-समय पर यह भी जांच करें कि उनके आदेशों का पालन किस स्तर तक हो रहा है। जिन विभागों और अधिकारियों को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं, वहां विशेष निगरानी की आवश्यकता है। क्योंकि प्रशासन की असली पहचान कागजों में नहीं, बल्कि जनता के अनुभव में दिखाई देती है।

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